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गुरुवार, 7 जून 2018

रिश्ता

कभी कभी सोचती  हूँ कि
रिश्ते दूरी से नहीं,
 दिलों से नापे जाते हैं ।

क्योंकि अक्सर एक दरवाजे से
दूसरे दरवाजे तक का सफ़र
तय करने में बरसों गुजर जाते हैं ।

पल्लवी गोयल 

मंगलवार, 5 जून 2018

तेरा

 कभी रेशम के कुछ धागे बुने
कभी फूलों के कुछ सांचे रचे
नाम  तो तेरा कहीं न लिखा था
बुनावट की हर गूँथ पर ,मन
कहता था,यह तेरा था।

पल्लवी गोयल

पुकार


दिल के रोम रोम से
जो तुझे पुकारा है
क्या सुनता है तू
कि तुझे कुछ भी
सुनना गवारा है।

न यहाँ ,न  वहाँ
नज़र आता है तू
सब कहते हैं
तूने ख़ुद को मेरे
पास सॅवारा है।

पल्लवी गोयल 

दर्द


 जब दर्द कुछ 
इतना बढ़ जाए 
हर इंतहां को 
पार  करता हुआ 
बस बेइंतहा हो जाए    
बोल पड़ती हूं 
मैं भी खुदा से 
याद कर बनाया था 
तूने ही मुझे भी 
हक असबाब  तमाम 
तूने दुनिया को दिए   
कुछ रोक इधर 
ताकि मैं भी
ठहर सकूं यहीं ।

पल्लवी गोयल 

शनिवार, 12 मई 2018

एक तस्वीर

  


गुलाबी से इस शहर में 

गुलाबी सा नशा है उनका भी 

रात बीतती है इंतजार में उनके

और दिन ख्वाब  में उनके ही 

बंद आंखों में नशा  ए इज़हार है  

खुली आंखों में दीदार ए इंतजार उनका ही

 ना वफा की उम्मीद ,ना दगा का डर 

बस दिल में रखी  एक तस्वीर सी उनकी ही ।

पल्लवी गोयल 
चित्र गूगल से साभार 

शनिवार, 7 अप्रैल 2018

परन्तु.......................


घुटुरुनियों घिसककर  अभी 
मां का हाथ पकड़ना था मुझे। 
काका की उंगली थामे 
थोड़ा सम्हलना था मुझे। 

दादी से कहानी सुनना और 
भइया से झगड़ना था मुझे। 
बहन के कपड़े पहन इतराना और 
माँ के आँचल  तले छिपना था मुझे। 

ककहरों को ज़ोर  से रटना  और 
पट्टी  पर खड़िया से लिखना था मुझे। 
सखियों के साथ उछलना 
पलंग के नीचे छिपना था मुझे। 


समय के साथ बढ़-बढ़ कर 
माँ का कद छूना  था मुझे। 
एक सुन्दर सी पियरी में लिपट कर
 पिया के  घर में बसना था मुझे। 

दो बच्चों  से माँ  और चार से 
चाची -ताई कहलवाना था मुझे। 
उन बच्चों को पढ़ाना ,खिलाना
डाँटना  और समझाना था मुझे। 

परन्तु.......................

 इनमे से कुछ भी करना
मेरे  भाग्य  में बदा नहीं।
जन्मदाता ने मेरा  भाग्य रचा,
मेरे भाग्यविधाता  ने नहीं।  

जैसे ही उसे पता चला कि 
उसकी पत्नी की कोख़  में पड़ी -
नारी हूँ मैं !!!!!!!!!!!!!!!!!

पल्लवी गोयल
चित्र साभार गूगल





शुक्रवार, 30 मार्च 2018

तन्हाई



ग़मे जिंदगी मुझे तुझसे कोई शिकवा नहीं ,
 हमक़दम था जो बीच राह अलविदा कह गया 

क्या लिपटे थे कलेजे से ज़माने के सितम कम! 
जो रुखसत ले इससे ,दे बैठा एक नया गम। 

खाए थे भर- भर के कसमे और वादे, 
जाते ही उस राह पर इस राह को भूले।  

धड़कनों  ने धक- धक जो पुकारा हर बार ,
हर बार आ लौटी ये पा  खाली  दीवार। 

रूह से रूह के मिलन का बता मैं  क्या करूँ ,
न लेती ये विदा ,न आती 'वो' जो पुकारूँ। 

हर तरफ है भीड़,गुलज़ार , तमाशे, ठहाके, 
बस तन्हा ये वज़ूद , समेटे बिखरे दिल के टुकड़े। 

पल्लवी गोयल 
चित्र साभार गूगल