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मंगलवार, 14 जुलाई 2026

प्राणप्रिय

 तुमको ढूँढे जब भी मेरा मन,

पास सदा ही पाता है।

इधर-उधर नजर घुमाती मैं,

संग तुम्हारा भाता है।

​तुम हो मेरे अंदर-बाहर,

तुमसे एक गहरा नाता है।

​न जोर किसी का चलता तुम पर,

मैं कितना जोर लगाती हूँ।

सरल स्वभाव के हो तुम कितने,

सदा तुम्हें बहलाती हूँ।

​तुमको न पाकर फिर 

आशा के दीप जलाती हूँ,

इधर-उधर मँडराती हूँ,

 तुमको ही  पास बुलाती हूँ।

​तुम्हारी हँसी को देख समझकर,

मैं कितना मुस्काती हूँ।

​अंदर-अंदर के तुम ज्यादा प्यारे,

या बाहर  ,न समझ पाती हूँ।

दोनों प्राण प्रिय हो मेरे,

बस तुम से ही मन बहलाती हूँ।

पल्लवी गोयल

सफ़र

 जीवन के इस सुनसान डगर में,

मिली हूँ मैं एकाकीपन से,

कभी मिली कुछ खुशियों से,

कभी मिली उस शांति से।

​यह सफ़र सुहाना प्यारा है,

यहाँ न कोई बेगाना है,

कोई नहीं इस डगर में कहीं भी,

फिर भी रास्ता पहचाना है।

​मंजिल भी केवल तुम हो,

साथी भी केवल तुम ही,

सहारा भी केवल तुम हो,

 मुश्किलें भी केवल तुम ही।

​जब पहुँचूँगी तुम तक,

तो मिल जाऊँगी तुम में ही,

राही शांति ,सुकून से मिल,

फिर तुम में ही मिल जाऊँगी।

​ओ मेरे जीवन के स्वामी,

थोड़ा और पास आ जाना तुम,

जो जरा बढ़ूँ मैं आगे को,

दो कदम आगे बढ़ाना तुम भी।

​मिलन जो होगा तुमसे स्वामी,

 न जरूरत होगी किसी और की,

हम तुम दोनों साथ मिलेंगे,

दूरी तय होगी एक और सफ़र की।

पल्लवी गोयल

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

सृष्टि और संतृप्ति

जीवन की इस विशाल सृष्टि में हम अक्सर द्वंद्वों, संघर्षों और अशांति के तूफानों से घिरे रहते हैं। कभी मन विचलित होता है, तो कभी परिस्थितियों की तपिश हमें थका देती है। ऐसे में, आत्मा केवल उस परम सत्य की शरण चाहती है जहाँ सब कुछ शांत और शीतल हो जाए।


​यह कविता कान्हा की उसी जादुई बाँसुरी की धुन और उनकी अनन्य शरणागति की पुकार है। यह एक भक्त की वह यात्रा है जो बाहरी कोलाहल से निकलकर आंतरिक संतृप्ति की खोज में निकली है। जब कान्हा का सान्निध्य मिलता है, तो हृदय की शुष्क क्यारी भी अमृत से सराबोर हो जाती है।




ओ कान्हा!तू बाँसुरी की मीठी धुन,

रोज सुनाया कर मुझको।


आग की लपटें जब भी घेरें,

 शीतल कर आया कर मुझको।


लहराते तूफानों का शोर दबा,

 मधुर बनाया कर मुझको।


चक्रावात, झंझावातों के ज़ोर को ,

सरल बना लहराया कर मुझको।


जब-मन विचलित तन बेहाल , 

धीरज में लाया कर मुझको।


अंधकार और गहरे में भी,

 मनदीप से रोशन कर मुझको।


शुष्क पड़ी मनक्प्यारी के,

अमृत बन नहलाया कर मुझको।


ओ कान्हा! तू अपनी शरणगति में,

 संतृप्त बसाया कर मुझको।

‐‐‐-पल्लवी गोयल

गुरुवार, 12 मार्च 2026

मौन

 

शीर्षक: मौन


भूमिका (कविता द्वारा):

मैं 'मौन' हूँ...

मैं शब्दों के बीच की वह चुप्पी हूँ, जिसे तुमने अक्सर शांति समझ लिया। मैं वह दीवार हूँ, जिसे तुमने खुद अपने चारों ओर इतना ऊँचा उठा लिया कि अब तुम्हें बाहर का उजाला भी दिखाई नहीं देता।

आज मैं, लेखिका की कलम से यहाँ सिर्फ कागज पर उतरने के लिए नहीं, बल्कि तुम्हारे भीतर सोए हुए उस साहस को जगाने आई हूँ जो अब 'मिट्टी' की तरह दबते-दबते बंजर होने लगा है।

​मैं तुम्हें आईना दिखाती हूँ—ताकि तुम देख सको कि तुम्हारे हिस्से की जो नाइंसाफी है, उसमें तुम्हारी अपनी खामोशी का कितना बड़ा हाथ है। मैं तुम्हें सिसकियों और चीत्कार के बीच खड़ा करती हूँ, ताकि तुम तय कर सको कि तुम्हें बंद कमरों का घुटन भरा कोना चाहिए या खुलकर जीने का आकाश।

पढ़िए मुझे, और देखिए कि क्या आप मुझमें छिपे उस 'झरोखे' को खोलने के लिए तैयार हैं?

​कविता:

​क्या तुम देख नहीं रहे, होने वाली नाइंसाफी को।

क्या फर्ज़ तुम्हारा यह नहीं, पर्तें खोलो इसके लिए।

​मौन की दीवार बहुत मोटी और ऊँची बना ली अब।

समय का तकाज़ा यही है, एक झरोखा खोलो तुम।

​मिट्टी भी जब दबती-दबती नीचे दबती जाती है।

एक समय आता है जब नीरस बंजर बन जाती है।

​दबा-दबा के गए जो सारे पाँव, वह अपने ही थे।

दोष क्या तुम्हारा नहीं था, जो तुम दबते ही गए।

​हर किसी पर कर्ज उसका खुद का भी होता है।

फिर क्यों मौन का पर्दा उसको ढकता रहता है।

​फूल खिलाना है तो उठो चीत्कार करो।

नहीं तो बंद कमरे और सिसकी स्वीकार करो।

​— पल्लवी गोयल

रविवार, 16 नवंबर 2025

जिंदगी तेरा शुक्रिया

 


जिंदगी तेरा शुक्रिया !

जो तूने मुझे चुना। 

जब खुशियाँ दी तूने, 

मैंने आसमान छुआ।

जब दु:ख दिये तूने,

मैंने अंतस को छुआ।

भीतर-बाहर दोनों का 

रस,भर-भर के पिया।

तू जो भी दे मुझे ,

दिल से स्वीकार है।

तेरे हर रंग का मुझे,

रहता इंतजार है।

रविवार, 24 अगस्त 2025

अजनबी तुम

 


तुम्हारी जगह और मेरी जगह, 

एक स्थान पर नहीं हो सकती, 

यह मुझे समझना होगा।

मेरा दिल तुम्हारा घर बन सकता है,

बस वही पर तुम्हें रहना होगा। 

बीते हुए अच्छे समय की 

झालरों से सजा है वह घर।

उसी समय के 'तुम' के साथ 

अब मुझे जीना होगा ।

नया 'तुम' पुराने 'तुम' को निगल जाएगा।

मुझे  इस नये 'तुम'से बचाना होगा ।

सूरज की किरणें, झरने का पानी 

चलने के बाद नहीं लौटते ।

चल चुके हम वहाँ से 

क्या हमें लौटना?

 पका फल खा चुके हैं हम 

क्या हमें सड़न से है मिलना?

 प्रेम से मिल चुके मन को 

क्या नफ़रत से  है मिलना?

 चलो !जाने-पहचाने इस 

रिश्ते को नया नाम दें।

अब अजनबी ही हमको रहना।

पल्लवी गोयल 

(चित्र साभार गूगल)


शुक्रवार, 15 जुलाई 2022

इक ख्वाब परेशाँ करता है

 इक ख्वाब परेशाँ करता है

सच हो जाता तो 

क्या अच्छा होता।

दिल के हुए 

हज़ार टुकडे

जुड़ जाते तो 

क्या अच्छा होता।

न फिक्र किसी  

की होती हमको

न दर्द कहीं 

पर होता।

इक ख्वाब परेशाँ करता है

सच होता तो क्या अच्छा होता।

पल्लवी गोयल