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गुरुवार, 12 मार्च 2026

मौन

 

शीर्षक: मौन


भूमिका (कविता द्वारा):

मैं 'मौन' हूँ...

मैं शब्दों के बीच की वह चुप्पी हूँ, जिसे तुमने अक्सर शांति समझ लिया। मैं वह दीवार हूँ, जिसे तुमने खुद अपने चारों ओर इतना ऊँचा उठा लिया कि अब तुम्हें बाहर का उजाला भी दिखाई नहीं देता।

आज मैं, लेखिका की कलम से यहाँ सिर्फ कागज पर उतरने के लिए नहीं, बल्कि तुम्हारे भीतर सोए हुए उस साहस को जगाने आई हूँ जो अब 'मिट्टी' की तरह दबते-दबते बंजर होने लगा है।

​मैं तुम्हें आईना दिखाती हूँ—ताकि तुम देख सको कि तुम्हारे हिस्से की जो नाइंसाफी है, उसमें तुम्हारी अपनी खामोशी का कितना बड़ा हाथ है। मैं तुम्हें सिसकियों और चीत्कार के बीच खड़ा करती हूँ, ताकि तुम तय कर सको कि तुम्हें बंद कमरों का घुटन भरा कोना चाहिए या खुलकर जीने का आकाश।

पढ़िए मुझे, और देखिए कि क्या आप मुझमें छिपे उस 'झरोखे' को खोलने के लिए तैयार हैं?

​कविता:

​क्या तुम देख नहीं रहे, होने वाली नाइंसाफी को।

क्या फर्ज़ तुम्हारा यह नहीं, पर्तें खोलो इसके लिए।

​मौन की दीवार बहुत मोटी और ऊँची बना ली अब।

समय का तकाज़ा यही है, एक झरोखा खोलो तुम।

​मिट्टी भी जब दबती-दबती नीचे दबती जाती है।

एक समय आता है जब नीरस बंजर बन जाती है।

​दबा-दबा के गए जो सारे पाँव, वह अपने ही थे।

दोष क्या तुम्हारा नहीं था, जो तुम दबते ही गए।

​हर किसी पर कर्ज उसका खुद का भी होता है।

फिर क्यों मौन का पर्दा उसको ढकता रहता है।

​फूल खिलाना है तो उठो चीत्कार करो।

नहीं तो बंद कमरे और सिसकी स्वीकार करो।

​— पल्लवी गोयल

रविवार, 16 नवंबर 2025

जिंदगी तेरा शुक्रिया

 


जिंदगी तेरा शुक्रिया !

जो तूने मुझे चुना। 

जब खुशियाँ दी तूने, 

मैंने आसमान छुआ।

जब दु:ख दिये तूने,

मैंने अंतस को छुआ।

भीतर-बाहर दोनों का 

रस,भर-भर के पिया।

तू जो भी दे मुझे ,

दिल से स्वीकार है।

तेरे हर रंग का मुझे,

रहता इंतजार है।

रविवार, 24 अगस्त 2025

अजनबी तुम

 


तुम्हारी जगह और मेरी जगह, 

एक स्थान पर नहीं हो सकती, 

यह मुझे समझना होगा।

मेरा दिल तुम्हारा घर बन सकता है,

बस वही पर तुम्हें रहना होगा। 

बीते हुए अच्छे समय की 

झालरों से सजा है वह घर।

उसी समय के 'तुम' के साथ 

अब मुझे जीना होगा ।

नया 'तुम' पुराने 'तुम' को निगल जाएगा।

मुझे  इस नये 'तुम'से बचाना होगा ।

सूरज की किरणें, झरने का पानी 

चलने के बाद नहीं लौटते ।

चल चुके हम वहाँ से 

क्या हमें लौटना?

 पका फल खा चुके हैं हम 

क्या हमें सड़न से है मिलना?

 प्रेम से मिल चुके मन को 

क्या नफ़रत से  है मिलना?

 चलो !जाने-पहचाने इस 

रिश्ते को नया नाम दें।

अब अजनबी ही हमको रहना।

पल्लवी गोयल 

(चित्र साभार गूगल)


शुक्रवार, 15 जुलाई 2022

इक ख्वाब परेशाँ करता है

 इक ख्वाब परेशाँ करता है

सच हो जाता तो 

क्या अच्छा होता।

दिल के हुए 

हज़ार टुकडे

जुड़ जाते तो 

क्या अच्छा होता।

न फिक्र किसी  

की होती हमको

न दर्द कहीं 

पर होता।

इक ख्वाब परेशाँ करता है

सच होता तो क्या अच्छा होता।

पल्लवी गोयल

गुरुवार, 9 जून 2022

विषपान करो !

 


विषपान करो !

जग दाता है ,

ना समझो 

वह अमृत देगा ।

जीना है 

उसके हक में  

मरना वह 

तुमको देगा।

नीलकंठ  बन 

धरो गले में ,

दिल दिमाग 

से दूर रखो।

व्यक्ति, व्यक्ति 

लालच देगा,

प्रेम ,झूठ का 

धंधा होगा ।

फिर आशा की 

बेल का झुलसा, 

सूखा फाँसी का 

फंदा होगा।

जीना खुद का 

खुद पर रखो।

जग को बस 

उससे दूर रखो।

याद रखो तुम 

अपने में पूरे।

विश्वास रखो 

और बढ़े चलो।

पल्लवी गोयल

शुक्रवार, 13 मई 2022

इंसान ?

 रिसता रहता जब तक 

दिलों में रिश्ता कहलाता है।

सूखे दिलों का मेल 

पराया बन जाता है।


साथी के कंधे पर झुकना 

विश्वास कहलाताहै। 

झुके पर आघात 

विश्वासघात  बन जाता है।


टूटे को और न तोड़ने देने का

 प्रयास प्रतिरोध कहलाता है।

तोड़ने वाले को तोड़ देना 

प्रतिशोध बन जाता है।


लड़खड़ाए को लकड़ी देना

 सहारा कहलाता है।

 उसकी गठरी हथिया लेने वाला 

कपटी बन जाता है।


पहले नियम पर चलने वाला 

व्यक्ति इंसान कहलाता है

दूसरे नियम को अपनाने वाला 

सांसारिक बन जाता है।


सांसारिक इंसान न बने 

वह सफल कहलाता है।

इंसान इंसान ही रहे 

वह मूर्ख बनता जाता है।

पल्लवी गोयल 

रविवार, 5 दिसंबर 2021

आँसू

 


दुनिया के इस रंगमंच पर 

खेले गये अंक कई।


दुख से भरी गाथाओं से

आँसू झर- झर गये कई।


कुछ लोगों  ने देखे केवल

जुड़कर आए साथ कई।


जिन्होंने हाथ बढ़ाए आगे 

बाद में किए सौदे कई।

पल्लवी गोयल