अब क्यों ऐ दिल तू बोलता वह बात
क्यों खोलता अपने कपाट।
जब भी कोशिशें कोई मुझसे हुई
तूने आँखें जोर से भींच दीं।
अक्स न कोई उनमें आने दिया
अश्कों को भी जबरन सिया।
मुस्कराहटें बाँटीं मुझे लाचार कर
हज़ार चोटें खाईं खुद को मारकर।
तन्हां रहा तू खुद में डूबा रहा
और मुझे उस भीड़ में चस्पा किया।
दिमाग ने बीच राह में छोड़ दिया
लाठी बन तू राह पर फिरता रहा।
आज 'वह' दिख ज़रा सा क्या गया
तू खुद से खुद को छोड़ चला ?
देखता रहा तू मंज़र आज तक
राह की रवानगी से बेराह तक।
आज जाता है तो फिर से सोच ले
गुमशुदा उदास न लौटे उस ओर से।
पल्लवी गोयल
(चित्र साभार गूगल )
