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शनिवार, 17 मार्च 2018

वही मेरी प्रीत , वही उम्मीद !



ग्वाल बाल का खेल कन्हैया 
गोपियों के वे रास रचैया। 


 यशोदा और ब्रज के दुलारे ,
नन्द बाबा की आँखों के तारे।


कालिया ,पूतना के उद्धारक 
दानव ,कंस वध  के कारक । 
 . 

वही वंशी की तान के नायक 
वही शंख के नाद सृजक। 


परम  उद्धारक गीता के गायक 
नीति ,धर्म के कुशल धनिक । 


पांचाली के चीर प्रदायक ,
राधा ,रुक्मणि की घनेरी प्रीत। 


घन ,जल,थल ,जन के पालक ,
वही मेरी प्रीत , वही उम्मीद !


पल्लवी गोयल 
चित्र साभार गूगल 

बुधवार, 7 मार्च 2018

मेरे गीत, मेरा संगीत


मेरे  होठों से निकली आह ही
 मेरे गीत हैं

रूह से निकली तान ही
संगीत है।

धड़कनों में बजता एक
साज़ है ।

साँसों की सरगम ही मेरी
आवाज़ है।

नसों में बहती नदिया ही मेरी
चाल है।

पलकों की झपकन ही
लय ताल है।

कहीं देख कोई सकता नहीं
मुझे स्पष्ट ही

पूरी मैं बस दिखती यहीं । 

पल्लवी गोयल 
चित्र साभार गूगल 


शुक्रवार, 2 मार्च 2018

ऐ दिल


अब क्यों ऐ  दिल तू बोलता वह बात 
क्यों खोलता अपने कपाट। 

 जब भी कोशिशें कोई मुझसे हुई 
तूने आँखें जोर से भींच दीं। 

अक्स न कोई उनमें आने दिया 
अश्कों को भी जबरन सिया। 

मुस्कराहटें बाँटीं मुझे लाचार  कर
हज़ार चोटें खाईं खुद को मारकर। 

तन्हां रहा तू खुद में डूबा रहा 
और मुझे उस भीड़ में चस्पा किया। 

दिमाग ने  बीच राह में छोड़ दिया 
लाठी बन तू राह पर फिरता रहा। 

आज 'वह' दिख ज़रा सा क्या गया 
तू खुद से खुद को छोड़ चला ?

देखता रहा तू मंज़र आज तक 
राह की रवानगी से बेराह तक। 

आज जाता है तो फिर से सोच ले  
गुमशुदा उदास न लौटे उस ओर  से। 

पल्लवी गोयल 
(चित्र साभार गूगल  )


बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

मौन


नि:शब्द, सागर , नदी, झरनों से
रिश्ता कुछ   गहरा है ।

इनके शोर में भी, बरसों बरस
का मौन ठहरा है ।

बाधा ,ऊँचाई  ,गर्त    हर कदम
पर भहरा है ।

पर इनका जल  इनकी मर्यादा
में ही ठहरा है


ऐ दिल, हृदय, शरीर तुम्हारे भी
सिर पर सेहरा है ।

दुनिया के कोलाहल  में भी
 जीवन शांत लहरा है।

पल्लवी गोयल 
( चित्र गूगल से साभार )











शनिवार, 17 फ़रवरी 2018

यादों का सफ़र




आँखे बंद करते ही 
तेरी यादों की खुशबू 
जब चूमती थी
 मेरे जेहन को 
उस रुमानियत में तेरे 
आने से खलल पड़ता था। 

चाँद  की गोलाई पर 
तेरे अक्स के उभरते ही
पलकों के झपक जाने से 
खलल पड़ता था।  

पत्तों की खड़खड़ाहट के
सन्नाटे  में बदल जाने से 
तेरे कहीं  रुक जाने की 
बदख्याली का डर  रहता था। 

और आज जब आँखें  खोल 
भूलना चाहती हूँ  तुझको 
तेरी यादों के ठहर जाने से
 खलल पड़ता है। 

पल्लवी गोयल

चित्र साभार गूगल 

सोमवार, 18 जुलाई 2016

ख्वाब

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हसीन  ख्वाब आते हैं 
और चले जाते हैं 
वास्तविकता के दर्द के परे 
ये अपनी ही दुनिया बनाते हैं 
स्थितियों का कोई दरवाजा 
इन्हें रोक नहीं पाता 
दिमाग में झलकती एक 
छाया  की खुशबू ही पर्याप्त है........  
इन्हें अपना धर्म 
निभाने देने के लिए
कर्म  करते बंद आँखों का 
इन्तजार भी इनसे नहीं होता
खुली आंखें भी इस धर्म 
का हिस्सा बन जाती हैं 
वास्तविकता से एक नाता 
इनका अवश्य रहता है 
यदि ये दिमाग में रहे तो 
बुलबुले से फूट बिखर जाते हैं ,
और कहीं ह्रदय में पहुंचे तो ,  कभी 
हिम श्रृंखला छूने को मज़बूर करते 
कभी टेलीफ़ोन हवाई जहाज की शक्ल 
में ढल के संसार में बिखर जाते हैं। ...... 
    

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

मेरी दुनिया

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अपनी सपनीली दुनिया की 
 मैं अकेली परी हूँ


यहाँ फूल मुस्काते 
हैं पेड़ खिलखिलाते 

हर एक पहाड़ 
 हैं वादियों में गीत गाते

हवाएँ  जब चलती 
हैं ठुमककर  लहराती 

प्रकृति मगन हो 
शांति  गुनगुनाती 

आसमां  का विस्तार  
बाँहों में नाप पाती 

पिता सा वृहद् रूप 
हूँ उसमें  ही पाती 

धरती की गोदी में 
झूलती है ये हस्ती 

घूमती फिरती हूँ 
निडर हो मैं  हँसती 

भौरें संदेशा  सुनाते 
पंख तितलियों के 
मुझको लुभाते 

जब भी मैं गुमसुम हूँ 
बैठी पकड़े किनारा 

छेड़ना मुझे कभी  ना
वहीँ होता अस्तित्व सारा 

उस दुनिया की सैर से
जब आती यहाँ पर

लगता है यह संसार 
मुझको प्यारा  प्यारा 







चित्र साभार गूगल