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रविवार, 9 अगस्त 2015

सीता माता का तृण


सीता माता  का  तृण,
क्यों न  पहुँचता ,
उन  बसों , खेतों  और  घरों  तक

जो  रोक  पाए उन
रावणों  को  वहीं  पर।

क्या  धरती  तृण शून्य
हो  चुकी है ?

या  'राम  का  आगमन'
बीती बात  बन  चुकी है।

लगता है  समुद्र  का  आकार
बहुत  बड़ा  हो  गया है।

तभी तो  रावण
इतना  निश्चिंत  हो गया है।

लंका  का  अभेद्य  किला  देख
अनेक  'रामों  ने  भी  रावण
बनना  स्वीकार कर  लिया है।

क्योंकि  वहाँ प्राप्य का अधिकार
और  सुरक्षा  दोनों का 
  गहरा अहसास है। 

शनिवार, 18 जुलाई 2015

तेरी याद

दिनों  दिन  बीतते गए,  रातें  आईं और  गईं।  दिन  आए और  गए,  पर  गई  न  तेरी याद ,  दिल  से  चाहते  हुए भी।

दिनों  दिन  बीतते गए, 
रातें  आईं और  गईं। 
दिन  आए और  गए, 
पर  गई  न  तेरी याद , 
दिल  से  चाहते  हुए भी। 

रविवार, 12 जुलाई 2015

प्रिय! तुम कब आओगे ?


       मंद मंद  बयार       
           पानी की  फुहार       
        पत्तों  पर  गिरती        
           पानी की  धार         
        इधर उधर  घूमती       
        दादुर  की  पुकार         
        दूर  से  आती  कहीं     
         मियाँ        मल्हार        
         सभी  आवाज  लगाते    
           हैं      बस    तुम्हें         
    प्रिय!  तुम  कब आओगे ? 

गुरुवार, 9 जुलाई 2015

इंतज़ार की घड़ी


इंतज़ार  की घड़ी बड़ी  क्यों  होती है? 
क्योंकि  इसकी  सुई , 
आम  घड़ियों  से  छोटी  होती है। 
चलती है  दस  कोस, 
बढ़ता है  एक  कदम  केवल। 
गंतव्य तक  पहुंचने में, 
बरसों गुज़र  जाते हैं।