नज़र नहीं आती मुझको ख्वाबों सी वह तस्वीर असलियत में कहीं। अंतर्मन की गाथा कहते ये शब्द ही मेरे अज़ीज़ हैं ........
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शनिवार, 12 मई 2018
शनिवार, 7 अप्रैल 2018
परन्तु.......................
घुटुरुनियों घिसककर अभी
मां का हाथ पकड़ना था मुझे।
काका की उंगली थामे
थोड़ा सम्हलना था मुझे।
दादी से कहानी सुनना और
भइया से झगड़ना था मुझे।
बहन के कपड़े पहन इतराना और
माँ के आँचल तले छिपना था मुझे।
ककहरों को ज़ोर से रटना और
पट्टी पर खड़िया से लिखना था मुझे।
सखियों के साथ उछलना
पलंग के नीचे छिपना था मुझे।
समय के साथ बढ़-बढ़ कर
माँ का कद छूना था मुझे।
एक सुन्दर सी पियरी में लिपट कर
पिया के घर में बसना था मुझे।
दो बच्चों से माँ और चार से
चाची -ताई कहलवाना था मुझे।
उन बच्चों को पढ़ाना ,खिलाना
डाँटना और समझाना था मुझे।
परन्तु.......................
इनमे से कुछ भी करना
मेरे भाग्य में बदा नहीं।
जन्मदाता ने मेरा भाग्य रचा,
मेरे भाग्यविधाता ने नहीं।
जैसे ही उसे पता चला कि
उसकी पत्नी की कोख़ में पड़ी -
नारी हूँ मैं !!!!!!!!!!!!!!!!!
पल्लवी गोयल
चित्र साभार गूगल
शुक्रवार, 30 मार्च 2018
तन्हाई
ग़मे जिंदगी मुझे तुझसे कोई शिकवा नहीं ,
हमक़दम था जो बीच राह अलविदा कह गया
क्या लिपटे थे कलेजे से ज़माने के सितम कम!
जो रुखसत ले इससे ,दे बैठा एक नया गम।
खाए थे भर- भर के कसमे और वादे,
जाते ही उस राह पर इस राह को भूले।
धड़कनों ने धक- धक जो पुकारा हर बार ,
हर बार आ लौटी ये पा खाली दीवार।
रूह से रूह के मिलन का बता मैं क्या करूँ ,
न लेती ये विदा ,न आती 'वो' जो पुकारूँ।
हर तरफ है भीड़,गुलज़ार , तमाशे, ठहाके,
बस तन्हा ये वज़ूद , समेटे बिखरे दिल के टुकड़े।
पल्लवी गोयल
चित्र साभार गूगल
शनिवार, 17 मार्च 2018
वही मेरी प्रीत , वही उम्मीद !
ग्वाल बाल का खेल कन्हैया
गोपियों के वे रास रचैया।
यशोदा और ब्रज के दुलारे ,
नन्द बाबा की आँखों के तारे।
कालिया ,पूतना के उद्धारक
दानव ,कंस वध के कारक ।
.
वही वंशी की तान के नायक
वही शंख के नाद सृजक।
परम उद्धारक गीता के गायक
नीति ,धर्म के कुशल धनिक ।
पांचाली के चीर प्रदायक ,
राधा ,रुक्मणि की घनेरी प्रीत।
घन ,जल,थल ,जन के पालक ,
वही मेरी प्रीत , वही उम्मीद !
पल्लवी गोयल
चित्र साभार गूगल
बुधवार, 7 मार्च 2018
शुक्रवार, 2 मार्च 2018
ऐ दिल
अब क्यों ऐ दिल तू बोलता वह बात
क्यों खोलता अपने कपाट।
जब भी कोशिशें कोई मुझसे हुई
तूने आँखें जोर से भींच दीं।
अक्स न कोई उनमें आने दिया
अश्कों को भी जबरन सिया।
मुस्कराहटें बाँटीं मुझे लाचार कर
हज़ार चोटें खाईं खुद को मारकर।
तन्हां रहा तू खुद में डूबा रहा
और मुझे उस भीड़ में चस्पा किया।
दिमाग ने बीच राह में छोड़ दिया
लाठी बन तू राह पर फिरता रहा।
आज 'वह' दिख ज़रा सा क्या गया
तू खुद से खुद को छोड़ चला ?
देखता रहा तू मंज़र आज तक
राह की रवानगी से बेराह तक।
आज जाता है तो फिर से सोच ले
गुमशुदा उदास न लौटे उस ओर से।
पल्लवी गोयल
(चित्र साभार गूगल )
बुधवार, 28 फ़रवरी 2018
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