तुमको ढूँढे जब भी मेरा मन,
पास सदा ही पाता है।
इधर-उधर नजर घुमाती मैं,
संग तुम्हारा भाता है।
तुम हो मेरे अंदर-बाहर,
तुमसे एक गहरा नाता है।
न जोर किसी का चलता तुम पर,
मैं कितना जोर लगाती हूँ।
सरल स्वभाव के हो तुम कितने,
सदा तुम्हें बहलाती हूँ।
तुमको न पाकर फिर
आशा के दीप जलाती हूँ,
इधर-उधर मँडराती हूँ,
तुमको ही पास बुलाती हूँ।
तुम्हारी हँसी को देख समझकर,
मैं कितना मुस्काती हूँ।
अंदर-अंदर के तुम ज्यादा प्यारे,
या बाहर ,न समझ पाती हूँ।
दोनों प्राण प्रिय हो मेरे,
बस तुम से ही मन बहलाती हूँ।
पल्लवी गोयल