जीवन के इस सुनसान डगर में,
मिली हूँ मैं एकाकीपन से,
कभी मिली कुछ खुशियों से,
कभी मिली उस शांति से।
यह सफ़र सुहाना प्यारा है,
यहाँ न कोई बेगाना है,
कोई नहीं इस डगर में कहीं भी,
फिर भी रास्ता पहचाना है।
मंजिल भी केवल तुम हो,
साथी भी केवल तुम ही,
सहारा भी केवल तुम हो,
मुश्किलें भी केवल तुम ही।
जब पहुँचूँगी तुम तक,
तो मिल जाऊँगी तुम में ही,
राही शांति ,सुकून से मिल,
फिर तुम में ही मिल जाऊँगी।
ओ मेरे जीवन के स्वामी,
थोड़ा और पास आ जाना तुम,
जो जरा बढ़ूँ मैं आगे को,
दो कदम आगे बढ़ाना तुम भी।
मिलन जो होगा तुमसे स्वामी,
न जरूरत होगी किसी और की,
हम तुम दोनों साथ मिलेंगे,
दूरी तय होगी एक और सफ़र की।
पल्लवी गोयल
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