जीवन की इस विशाल सृष्टि में हम अक्सर द्वंद्वों, संघर्षों और अशांति के तूफानों से घिरे रहते हैं। कभी मन विचलित होता है, तो कभी परिस्थितियों की तपिश हमें थका देती है। ऐसे में, आत्मा केवल उस परम सत्य की शरण चाहती है जहाँ सब कुछ शांत और शीतल हो जाए।
यह कविता कान्हा की उसी जादुई बाँसुरी की धुन और उनकी अनन्य शरणागति की पुकार है। यह एक भक्त की वह यात्रा है जो बाहरी कोलाहल से निकलकर आंतरिक संतृप्ति की खोज में निकली है। जब कान्हा का सान्निध्य मिलता है, तो हृदय की शुष्क क्यारी भी अमृत से सराबोर हो जाती है।
ओ कान्हा!तू बाँसुरी की मीठी धुन,
रोज सुनाया कर मुझको।
आग की लपटें जब भी घेरें,
शीतल कर आया कर मुझको।
लहराते तूफानों का शोर दबा,
मधुर बनाया कर मुझको।
चक्रावात, झंझावातों के ज़ोर को ,
सरल बना लहराया कर मुझको।
जब-मन विचलित तन बेहाल ,
धीरज में लाया कर मुझको।
अंधकार और गहरे में भी,
मनदीप से रोशन कर मुझको।
शुष्क पड़ी मनक्प्यारी के,
अमृत बन नहलाया कर मुझको।
ओ कान्हा! तू अपनी शरणगति में,
संतृप्त बसाया कर मुझको।
‐‐‐-पल्लवी गोयल

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